गोलू हाथी की सूँड़ में गुदगुदी हो रही थी।
‘आ… आ…’
पास में चिड़िया अपने बच्चों को सुला रही थी। गोलू थोड़ा दूर चला गया।
‘आ… आ…’
वहाँ खरगोश पत्तों का छोटा घर बना रहा था। गोलू और आगे बढ़ गया।
एक खाली जगह पर पहुँचकर उसने अपनी सूँड़ रूमाल में ढकी।
‘छीं!’
इतनी छोटी छींक! गोलू ने हैरानी से अपनी सूँड़ देखी।
खरगोश पीछे से आया। ‘बस इतनी-सी?’
गोलू हँस पड़ा। ‘मैंने तो बहुत बड़ी छींक की तैयारी की थी!’
चिड़िया भी आ गई। ‘तुमने हमारे आराम का ध्यान रखा। धन्यवाद।’
गोलू मुस्कुराया। उसकी सूँड़ में अब गुदगुदी नहीं थी।
तीनों पेड़ की छाया में बैठ गए। खरगोश ने अपने घर की बात सुनाई। चिड़िया ने धीरे से गाना गाया।
तभी खरगोश की नाक हिली।
‘आ… आ…’
गोलू ने तुरंत एक साफ़ रूमाल आगे बढ़ाया।
सब धीरे-धीरे हँसने लगे।


