कबीर की खिलौना रेल का नाम चुकचुक था।
आज रेल में तीन मुसाफ़िर थे—भालू, खरगोश और कपड़े की गुड़िया।
भालू पहले डिब्बे में बैठा। खरगोश दूसरे में। गुड़िया तीसरे में।
‘मैं आगे बैठूँगी,’ गुड़िया की आवाज़ बनाकर छोटी बहन ने कहा।
‘आगे तो मैं हूँ,’ कबीर ने भालू की आवाज़ में जवाब दिया।
दोनों ने रेल रोक दी।
दादी पास बैठी थीं। उन्होंने पूछा, ‘क्या अगली यात्रा में जगह बदल सकते हैं?’
कबीर ने सोचा। बहन ने सिर हिलाया।
पहला चक्कर भालू आगे बैठा। दूसरे चक्कर में गुड़िया। तीसरे में खरगोश।
जब भालू सबसे पीछे पहुँचा, कबीर ने उसे खिड़की से बाहर झाँकाया।
‘अरे! यहाँ से तो पूरी रेल दिखती है!’
बहन हँस पड़ी। ‘आख़िरी डिब्बा भी मज़ेदार है।’
चुकचुक फिर चल पड़ी।
छुक-छुक, छुक-छुक!
इस बार सबके पास अपनी जगह थी। और सबकी बारी भी।


