तारा बगीचे में बैठकर चित्र बना रही थी। उसके पास छह रंग थे और एक बहुत बड़ा कागज़।
तभी पीली तितली फूल पर आ बैठी। तारा ने पीला रंग उठाया। तितली उड़कर सफ़ेद फूल पर गई। तारा ने सफ़ेद रंग ढूँढ़ा।
डिब्बे में सफ़ेद रंग था ही नहीं!
‘अब फूल कैसे बनाऊँ?’ उसने नाना से पूछा।
नाना ने कागज़ की ओर इशारा किया। ‘तुम्हारे पास सफ़ेद रंग पहले से कहाँ है?’
तारा ने ध्यान से देखा। पूरा कागज़ सफ़ेद था। उसने फूल की पंखुड़ियाँ खाली छोड़ दीं और उनके आसपास हरी पत्तियाँ बना दीं। फूल दिखाई देने लगा।
फिर उसने लाल फूल बनाया। नीला आसमान बनाया। लेकिन तितली के पंखों पर छोटे-छोटे निशान बनाते समय उसकी कोहनी हिली। एक बड़ा पीला धब्बा पड़ गया।
तारा का चेहरा उतर गया।
‘चित्र ख़राब हो गया।’
नाना ने पूछा, ‘इस धब्बे को देखकर तुम्हें क्या याद आता है?’
तारा ने कागज़ घुमाया। पहले एक तरफ़ से देखा, फिर दूसरी तरफ़ से।
‘आम!’ वह बोली।
उसने धब्बे में डंठल और पत्ती जोड़ दी। अब कागज़ पर एक पका आम था। उसके पास तितली भी थी और फूल भी।
घर लौटते समय तारा ने अपने रंगों के डिब्बे पर नया नाम लिखा—रंग और नए रास्ते।
नाना ने पूछा, ‘नए रास्ते कितने हैं?’
तारा मुस्कुराई। ‘अभी गिने नहीं हैं।’


